एक फौजी के बॉर्डर पर चले जाने के बाद..._कविता
एक फौजी के बॉर्डर पर चले जाने के बाद,
शक्तिविहीन मुस्कुराहट के साथ जीते हैं
माता-पिता, भाई-भाभी, घर के बच्चे और इन सबके अलावा भी,
कहीं बंद कमरे में सिसकती है,
उनकी शरीक-ए-हयात।
दोनों ने क्या खूब मोहब्बत की,
है मीलों की दूरी और
बिना नेटवर्क बातें अधूरी
एक-दूजे को याद कर
कर लेते हैं दोनों ही
अपने दिल की बात ।
एक फौजी के बॉर्डर पर
चले जाने के बाद,
खुद से गिले-शिकवे करती हैं,
पिछली बार का किस्सा
अब भी मुझे याद है,
सिक्कीम के पहाड़ों में
मुझसे बात करने के लिए
मिलों चलकर बर्फ़ीले तूफ़ान में
आपका बर्फ़ होना कमाल है,
आपकी आशिकी और मोहब्बत मुझसे बेशुमार है ।
इस बार वादा किए थे घर आ जाएँगे आज,
सुबह से शब गुज़र गई,
ना मैसेज कोई आया,
ना आपके नाम की रिंग बजी,
मैं इंतज़ार करती रह गई,
और नहीं आए आप....
वाकिफ़ होंगे आप ही,
कहीं बंद कमरे में सिसकती है
आपकी शरीक-ए-हयात।
बॉर्डर पर ड्यूटी में तैनात
फौजी के दिल से भी
आती है ये सदा,
इक खुद से ग़िला बाक़ी रहा..
दुनिया को छोड़ सिर्फ़ तुमसे मैं वाकिफ़ रहा..
है तुम्हें क्या इल्म मिरे साहिब
महफ़िल में रह कर भी
तुम बिन मैं तन्हा ही तन्हा रहा....
तुम्हीं न कहती थी,
फौजी से मोहब्बत है,
दूँगी साथ चाहे जो हो हालात ।
यही सेना की ड्यूटी है
ज़ीरो मिनट में हो जाना है तैयार।
हम जानते हैं,
कहीं बंद कमरे में सिसकती होगी, हमारी शरीक-ए-हयात।
अबकी छुट्टी मंजूर हो गई है,
ज़रूर आएँगे हम,थोड़ा और
माता-पिता, भाई-भाभी, घर के बच्चे और इन सबके अलावा भी,
कहीं बंद कमरे में सिसकती है,
उनकी शरीक-ए-हयात।
दोनों ने क्या खूब मोहब्बत की,
है मीलों की दूरी और
बिना नेटवर्क बातें अधूरी
एक-दूजे को याद कर
कर लेते हैं दोनों ही
अपने दिल की बात ।
एक फौजी के बॉर्डर पर
चले जाने के बाद,
खुद से गिले-शिकवे करती हैं,
पिछली बार का किस्सा
अब भी मुझे याद है,
सिक्कीम के पहाड़ों में
मुझसे बात करने के लिए
मिलों चलकर बर्फ़ीले तूफ़ान में
आपका बर्फ़ होना कमाल है,
आपकी आशिकी और मोहब्बत मुझसे बेशुमार है ।
इस बार वादा किए थे घर आ जाएँगे आज,
सुबह से शब गुज़र गई,
ना मैसेज कोई आया,
ना आपके नाम की रिंग बजी,
मैं इंतज़ार करती रह गई,
और नहीं आए आप....
वाकिफ़ होंगे आप ही,
कहीं बंद कमरे में सिसकती है
आपकी शरीक-ए-हयात।
बॉर्डर पर ड्यूटी में तैनात
फौजी के दिल से भी
आती है ये सदा,
इक खुद से ग़िला बाक़ी रहा..
दुनिया को छोड़ सिर्फ़ तुमसे मैं वाकिफ़ रहा..
है तुम्हें क्या इल्म मिरे साहिब
महफ़िल में रह कर भी
तुम बिन मैं तन्हा ही तन्हा रहा....
तुम्हीं न कहती थी,
फौजी से मोहब्बत है,
दूँगी साथ चाहे जो हो हालात ।
यही सेना की ड्यूटी है
ज़ीरो मिनट में हो जाना है तैयार।
हम जानते हैं,
कहीं बंद कमरे में सिसकती होगी, हमारी शरीक-ए-हयात।
अबकी छुट्टी मंजूर हो गई है,
ज़रूर आएँगे हम,थोड़ा और
इंतज़ार, इंतज़ार, इंतज़ार...
-सीमा सिंह
मुंबई विश्वविद्यालय
मुंबई
-सीमा सिंह
मुंबई विश्वविद्यालय
मुंबई

बहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंधन्यवाद मैडम 🌻
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