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मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इश्क समाधि_उपन्यास_समीक्षा

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 http://hindikitab.com/HindiKitab/GetBookDetail?Bkmst_cd=000865 देखने में सुंदर देहयेष्टि की स्त्रियों को जब उनके मनचाहे देह से कामरूपी सुख की प्राप्ती नहीं होती तब वही तिरस्कार के तीर से घायल स्त्री प्रतिशोध की ज्वाला में जलती हुई अपने शीलगुण को ताक पर रख वह सारे कर्म करती है जिससे उसका तथाकथित (सो कॉल्ड) बड़प्पन बरकरार रहे और इस अग्नि कुंड में वह अपना तन, मन, धन सर्वस्व स्वाहा कर देती है । और कहा जाता है कि, अपना शरीर, चरित्र, मान-मर्यादा, बुद्धी, तर्क सब कुछ गवाँने के बाद ही जीवन का वास्तविक सत्य अक्ल के ठिकाने लगता है । ऐसी ही एक मार्मिक-यथार्थ कथावस्तु लिए #बिहार - #आरा जिला, #एकवना #गाँव के नए उभरते #लेखक #ऋत #विकास अपने #प्रथम #उपन्यास #इश्क़ #समाधि से आधुनिकता की चकाचौंध में आँखें गड़ाकर दौड़ रहे युवाओं को जीवन के वास्तविक प्रेम एवं सत्य का चश्मा देने का कार्य किया है । आधुनिक विचार, आत्मविश्वास, और विपरीत परिस्थितियों का सामना कर लक्ष्य को प्राप्त करने की योग्यता रखने वाली #योगिना तथा इंद्रिय-मन-बुद्धि-आत्मा, अलौकिक प्रेम की पराकाष्ठा लिए #फकीरा के द्वारा वर्तमान ...

थाती_कहानी_डॉ. नीरज सिंह

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  http://humbhojpuria.com/2020/04/20/stock/ भोजपुरी भाषा के मिट्टी के सौंधी सी महक लेले #डॉ . #नीरज #सिंह जी द्वारा लिखल कहानी #थाती पढ़े के मौके मिलल । कहानी अपना शीर्षक के अनुरूप ही भोजपुरी कथा क्षेत्र में आपन महत्वपूर्ण स्थान चिन्हित करे में पूर्ण रूप से कामयाब  साबित भईल बा। कहानी के कथानक में बाबू वीरकुंवर सिंह जे बिहार आरा जिला के गौरव हवन उनकर पत्नी रानी और प्रेमिका मेहरुन्निसा तीनों के जीवन से जुड़ल मार्मिक अउर संवेदनशील मोड़ अउर त्रिशंकु प्रेम के कथा के रूप में प्रस्तुत कईल बा। कहानी के शुरुवात में ही जगदीशपुर गाँव के  हिन्दू-मुस्लिम समाज के आपसी प्रेम के मिठास, चिरिया चुरउँग के जागला के साथे ही गाँव के सभे लोग के होखे वाला सुबेर के वर्णन से ग्रामीण जनजीवन, प्राकृतिक छटा अउर देशकाल के चित्रण के अत्यंत जीवंत रूप से पाठक लोग के दिल में उकेरल गईल बा। समाज के जब कोई प्रतिष्ठित, सम्माननीय अउर पसंदीदा व्यक्ति के जीवन में जब कोई नया मोड़ आवेला या कोई घटना घटित होला त उनसे जुड़ल, पहचानल अउर जे ना पहचानत होई उहो सबका का दिल में बसल प्यार, चिंता अउर हालात ठिक होखे के चिरौ...

वो सूना 'गाछ'_कविता

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प्रस्तुत कविता मेरे गाँव के आम के बगीचे में मेरा इंतजार करते उस गाछ अर्थात उस वृक्ष/पेड़/दरख्त/ की पुकार है। मेरे साथी, मेरे आम और जामुन के वृक्ष जो आज सूनेपन में वहीं मेरी बाट जोह रहे हैं। बदलते परिवेश में उनकी आज जो अवस्था है मुझे विचलित करती है। काश! ये आगे बढ़ जाने की ज़रूरतें यहीं थम जाएँ ..वो सुकून की छाँव, डाली पर झूले, भाई-बहनों के साथ एक आम के लिए होती नोंक-झोंक संग बगीचे में खाट पर बैठी नानी भी मिल जाए.... https://www.maatribhasha.com/yugmanch_read_poem.php?poem_id=YUGM102070 वो एक बीज, मिट्टी, पानी, प्रकाश पाकर अंकुरित हो, कोंपल, मंजरी, फूल-फल सृजन करता शून्य से विस्तृत रूप पाकर तल से शिखर की आकाशगामी ऊँचाई नापता।   बड़े जतन से, झुरमुटों से छानकर सूर्यप्रभा उज्जवलित करता उसे, जो है अचला बयार संग कर अठखेलियाँ सराबोर करता शुष्क धरा।   सोहबत खोज, परिंदों, किशोरों के बालमन का अपने अंजुमन में सदा बसेरा रखता बिठाकर उन्हें अपनी डाल-टहनियों पर उनके कल्पनाओं की उड़ान भरता। निज अभीप्सा में, शरणार्थी बने थे कभी, इसके साए में गुलैल बरसाते थे यूँ ही, खट-मिठ्ठे लालच में कजरी भी गाते थ...

गलत देह में कैद हूँ मैं..._कविता

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साथियों, स्त्री तथा पुरुष प्रकृति के दायरे में सीमित ना रहकर अपनी एक अलग पहचान लिए किन्नर (तृतीय लिंगी/थर्ड जेंडर व्यक्ति) भी हमारे ही परिवार तथा समाज की परिधि में आते हैं क्योंकि इनका जन्म भी पूर्णरूपेण स्त्री-पुरुष के द्वारा ही होता है जैसे कि हम सभी हैं। इसलिए इनके अस्तित्व को स्वीकारना और इन्हें सम्मान देना हमारा कर्तव्य है, हमारी जिम्मेदारी है। इसी संदर्भ में - एक तृतीय लिंगी व्यक्ति के जीवन के कटु सत्य को, अंतर्मन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने की कोशिश करती मेरी कविता 'गलत देह में कैद हूँ मैं' आपके सभी के समक्ष प्रस्तुत है। मुझे उम्मीद है यह कविता समाज में किन्नर समाज के प्रति जो शारीरिक/मानसिक भ्रम है उसे दूर कर, जागरूकता लाने हेतु समर्थ होगी। https://www.maatribhasha.com/yugmanch_read_poem.php?poem_id=YUGM102066 ना मरद में गिनती ना जनाना-सी दिखती, सामान्य से विशिष्ट हूँ, इसलिए सबसे दूर हूँ मैं... गलत देह में कैद हूँ मैं... पुरुष जैसी काया, विकृत, अर्धविकसित लिंग पाकर, स्वयं का नारी रूप स्वीकारती, साज-श्रृंगार करती तन से नहीं पर मन से स्त्री ही हूँ मैं... बस गलत देह में कैद ...

लोकगीतों में ध्वनित जीवन के स्वर_भोजपुरी लोकगीत_किताब

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https://youtu.be/Y5Lq2i6hh1s   https://www.amazon.in/dp/8194665787/ref=cm_sw_r_wa_awdb_imm_t1_6WWF08FHTMNZVVX80MRF वाचिक परंपरा की धरोहर, लोकगीतों की यह विशेषता रही है समकालीन  परिस्थितियों को मार्मिकता के साथ ही व्यंग्यात्मक रूप से लयबद्ध कर अभिव्यक्त करने की। पारंपरिक रूप से गाये जाने वाले लोकगीतों को वर्तमान समय में भी घर-घर में सुना जा सकता है। हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय से प्रोफ़ेसर डॉक्टर दत्तात्रय मुरुमकर सर के मार्गदर्शन में एम. फिल. उपाधि हेतु चयनित विषय लोकगीतों पर  संपन्न शोध अब पुस्तक के रूप में भी प्रस्तुत है। लोकगीत क्षेत्र विशेषानुरूप होते हैं और इस पुस्तक में अन्य आंचलिक क्षेत्रों के लोकगीतों के साथ आरा, बिहार क्षेत्र के भोजपुरी लोकगीतों का विशेष संदर्भ दिया गया है। अधिकतर लोकगीत मेरे द्वारा यहाँ के स्थानीय महिलाओं से मिलकर लिखवाए गए हैं। उन महिलाओं से प्राप्त सहयोग और जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।  मुझे पूरा विश्वास है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठकों के मन में लोकगीतों के प्रति जिज्ञासा तो बढ़ेगी ही साथ ही भोजपुरी लोकगीतों में अभिव्यक्त जनजीवन...