गलत देह में कैद हूँ मैं..._कविता
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ना जनाना-सी दिखती,
सामान्य से विशिष्ट हूँ,
इसलिए सबसे दूर हूँ मैं...
गलत देह में कैद हूँ मैं...
पुरुष जैसी काया, विकृत,
अर्धविकसित लिंग पाकर,
स्वयं का नारी रूप स्वीकारती,
साज-श्रृंगार करती
तन से नहीं पर मन से स्त्री ही हूँ मैं...
बस गलत देह में कैद हूँ मैं...
स्तन, योनि, गर्भाशय
जन्म से हैं अधूरे मिले,
नहीं होती रजस्वला,
बच्चे भी नहीं जन सकती,
पर प्रीति की अनुभूति महसूस करती
प्रेम, समर्पण, ममता की मूरत हूँ मैं...
बस गलत देह में कैद हूँ मैं...
घर से डोली नहीं उठती,
अपनों संग हँसी ठिठोली नहीं कर सकती,
दद्दा, दिदी की खुशियों के खातिर,
प्यारा आशियाँ छोड़ने को विवश,
बेबस, मजबूर हूँ मैं...
क्योंकि गलत देह में कैद हूँ मैं...
तिरछी निगाहों से घूर मुझे,
गलीच, हीन, तिरस्कृत, अपमानित करते हैं...
कुछ मुझसे डरते,
तो कुछ धमकाते और घिन्नाते हैं...
सब कुछ सहकर
रक्ताभ आँसू मौन हूँ मैं...
क्योंकि गलत देह में कैद हूँ मैं...
इस अनादर्श भंग अंग को,
चीर-फाड़ कर, काट-जोड़कर,
दैहिक, मानसिक ज़ख्म,
दाह को परास्त कर
आदर्श लुभावन बनाने हेतु
रोम-रोम सिहरती हूँ मैं...
क्योंकि गलत देह में कैद हूँ मैं...
पृथक ना करो, त्याज्य ना मानो,
किंचित तुम गर मनुज ही समझो,
अपनों में परायी, गैरों में अपनापन तलाशती,
बिछुड़ी डार से एक टोह हूँ मैं...
क्योंकि गलत देह में कैद हूँ मैं...
*सीमा सिंह*

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